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भारत में IVF का खर्च बना आर्थिक संकट: 90% जोड़े भारी कर्ज में धकेले गए–अध्ययन

दिनांक: Saturday, 06 December 2025 | समय: 10:50 PM | लेखक: | श्रेणी: राष्ट्रीय

आईवीएफ 10 में से 9 जोड़ों को विनाशकारी कर्ज में धकेल देता है; अध्ययन में पीएम-जेएवाई कवर 81,332 रुपये प्रति चक्र की सिफारिश की गई है

नई दिल्ली। भारत में बांझपन का उपचार परिवारों पर गंभीर आर्थिक बोझ डाल रहा है। एक ताज़ा बहु-केंद्रित अध्ययन में पाया गया है कि आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) से गुजरने वाले करीब 90 प्रतिशत दंपति भारी खर्च के कारण आर्थिक संकट में पहुँच जाते हैं, वह भी तब जब उपचार सरकारी अस्पतालों में कराया जाए।

अध्ययन के अनुसार, भारत में 3.9 से 16.8 प्रतिशत दंपति बांझपन से प्रभावित हैं और उपचार की लागत उनकी पहुंच से बाहर होती जा रही है। सार्वजनिक अस्पतालों में एक आईवीएफ चक्र पर औसतन 1.10 लाख रुपये और निजी अस्पतालों में 2.30 लाख रुपये तक का खर्च आता है। परिणामस्वरूप अधिकांश परिवारों को कर्ज लेना पड़ रहा है, जबकि केवल 5 प्रतिशत मरीजों के पास बीमा कवरेज उपलब्ध है—वह भी अत्यंत सीमित।

अस्पताल दक्षता के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि एक आईवीएफ चक्र की स्वास्थ्य प्रणाली लागत लगभग 81,332 रुपये है। इसी आधार पर अध्ययन ने सुझाव दिया है कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) में यदि आईवीएफ जोड़ा जाए, तो 81,332 रुपये की प्रतिपूर्ति दर तय की जा सकती है।

यह अध्ययन आईसीएमआर-एनआईआरआरसीएच (मुंबई) के एचटीए रिसोर्स हब द्वारा प्रधान अन्वेषक डॉ. बीना जोशी के नेतृत्व में किया गया। अध्ययन PGIMER चंडीगढ़, SRIHER चेन्नई, मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज दिल्ली, SAT अस्पताल तिरुवनंतपुरम और JNMC वर्धा में संचालित किया गया। प्रत्येक केंद्र पर 30 आईवीएफ दंपतियों और 100 बांझपन रोगियों से विस्तृत आंकड़े जुटाए गए।

अध्ययन ने यह भी उजागर किया कि आर्थिक दबाव केवल आईवीएफ तक सीमित नहीं है। पीसीओएस, एंडोमेट्रियोसिस, ट्यूबल डिज़ीज़ या पुरुष-कारक बांझपन जैसी स्थितियों में इलाज करा रहे 25 प्रतिशत दंपतियों ने भी विनाशकारी खर्च का सामना किया। गैर-आईवीएफ उपचारों पर औसतन 11,317 रुपये का खर्च आता है, जिसमें निजी अस्पतालों में चिकित्सा लागत अधिक और सार्वजनिक अस्पतालों में अप्रत्यक्ष व यात्रा खर्च अधिक होता है।

अध्ययन में इलाज करा रहे दंपतियों की जीवन गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव दर्ज किया गया। महिलाओं में अवसाद, दर्द और चिंता के लक्षण अधिक मिले, जबकि पुरुषों में चिंता स्तर उल्लेखनीय रूप से बढ़ा पाया गया।

आईवीएफ में ओलिगोस्पर्मिया और ट्यूबल फैक्टर बांझपन प्रमुख कारण रहे, जबकि गैर-आईवीएफ समूह में पीसीओएस सबसे आम रोग निदान के रूप में सामने आया।

शोधकर्ता मानते हैं कि चूंकि बांझपन उपचार में अधिकांश खर्च ओपीडी में होता है, इसलिए PM-JAY को आईवीएफ कवरेज प्रभावी बनाने के लिए अपनी मौजूदा संरचना में बदलाव लाना होगा, क्योंकि वर्तमान में ओपीडी खर्च शामिल नहीं है। विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि CGHS मानकों और NICE दिशानिर्देशों की तर्ज पर तीन आईवीएफ चक्रों तक की प्रतिपूर्ति पर विचार किया जा सकता है।

यह अध्ययन संकेत देता है कि भारत में बांझपन उपचार की वित्तीय चुनौती स्वास्थ्य नीति में त्वरित हस्तक्षेप की मांग करती है, ताकि मातृत्व की आकांक्षा लिए दंपतियों को आर्थिक संकट में न धकेला जाए।

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