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नई दिल्ली। विदेश मामलों पर संसदीय स्थायी समिति ने चेतावनी दी है कि बांग्लादेश में उभरती राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति भारत के लिए 1971 के युद्ध के बाद सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकती है। समिति ने इस स्थिति को इस्लामी ताकतों के पुनरुत्थान, कमजोर होती घरेलू राजनीतिक संरचना और ढाका में चीन व पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव से जोड़ते हुए क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बताया है।
गुरुवार को लोकसभा में प्रस्तुत अपनी 9वीं रिपोर्ट ‘भारत–बांग्लादेश संबंधों का भविष्य’ में समिति ने कहा कि यह संकट तत्काल अस्तित्वगत खतरा नहीं है, लेकिन यह भारत की पड़ोस नीति और दीर्घकालिक सुरक्षा हितों के लिए एक गहरी रणनीतिक परीक्षा है। समिति की अध्यक्षता कांग्रेस सांसद शशि थरूर कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1971 में भारत के सामने चुनौती मानवीय और अस्तित्वगत थी, जबकि वर्तमान स्थिति एक पीढ़ीगत असंतोष, राजनीतिक ढांचे में बदलाव और भारत से दूर संभावित रणनीतिक पुनर्संरेखण से जुड़ी है। समिति ने चेताया कि यदि भारत समय रहते अपनी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता, तो उसे ढाका में युद्ध के कारण नहीं बल्कि अप्रासंगिक हो जाने के कारण रणनीतिक स्थान खोने का खतरा है।
अवामी लीग की घटती पकड़
समिति ने बांग्लादेश की सत्तारूढ़ अवामी लीग के घटते राजनीतिक प्रभुत्व को अनिश्चितता का बड़ा स्रोत बताया। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2024 के चुनावों में पार्टी को 300 में से 224 सीटें मिलीं, लेकिन अनुमानित 40 प्रतिशत मतदान ने राजनीतिक वैधता, संस्थागत नियंत्रण और जनविश्वास को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
शेख हसीना का भारत प्रवास
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में प्रवास पर समिति ने कहा कि यह भारत की सभ्यतागत परंपरा और मानवीय मूल्यों के अनुरूप है। समिति ने सरकार को सलाह दी कि वह मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखते हुए ऐसे मामलों को संवेदनशीलता के साथ संभाले।
चीन–पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका
रिपोर्ट में कहा गया कि बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती पहुंच भारत के पारंपरिक प्रभाव को कमजोर कर सकती है और उसकी रणनीतिक गणनाओं को जटिल बना सकती है। इस्लामवादी समूहों की नई सक्रियता और युवाओं के नेतृत्व वाला राष्ट्रवाद बांग्लादेश की आंतरिक सुरक्षा और पूरे क्षेत्र के लिए अस्थिर कारक बन सकता है।
क्षेत्रीय सहयोग पर भारत का रुख
विदेश सचिव ने समिति को बताया कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को अपनी राज्य नीति के रूप में जारी रखता है, तब तक सार्क को पुनर्जीवित करने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि बिम्सटेक, जिसका मुख्यालय ढाका में है, क्षेत्रीय सहयोग के लिए अधिक प्रभावी मंच हो सकता है।
भारत की तैयारी पर सवाल
समिति ने यह भी सवाल उठाया कि स्पष्ट चेतावनी संकेतों और मीडिया रिपोर्टिंग के बावजूद भारतीय एजेंसियां बांग्लादेश के राजनीतिक संकट का पूर्वानुमान क्यों नहीं लगा सकीं। सरकार ने जवाब में कहा कि स्थिति पर निरंतर निगरानी और आकलन किया जा रहा है।
समिति की सिफारिशें
रिपोर्ट के अंत में समिति ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह 1971 की भावना और आपसी सम्मान पर आधारित लोकतांत्रिक, स्थिर, शांतिपूर्ण और समावेशी बांग्लादेश की वकालत जारी रखे। साथ ही, सभी राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक समाज के हितधारकों के साथ निरंतर राजनयिक संवाद बनाए रखने की सिफारिश की गई। इसमें ट्रैक-II और ट्रैक-1.5 कूटनीति, संसदीय आदान-प्रदान, थिंक-टैंक, शिक्षाविद, मीडिया और सांस्कृतिक संगठनों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया।


















