दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों के मामलों में फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) लगातार पहले स्थान पर बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष कैंसर से होने वाली कुल मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा फेफड़ों के कैंसर का होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि देर से निदान, व्यापक जोखिम कारक और जटिल उपचार प्रक्रिया इसे सबसे घातक बनाते हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार लंग कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते। शुरुआती चरण में मरीज सामान्य खांसी या हल्की सांस की तकलीफ को नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक सीने में लगातार दर्द, खून की खांसी, वजन तेजी से घटना या गंभीर सांस की समस्या सामने आती है, तब तक कैंसर उन्नत अवस्था में पहुंच चुका होता है।
फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख कारण धूम्रपान माना जाता है। सिगरेट, बीड़ी और अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन करने वालों में इसका खतरा कई गुना अधिक होता है। इसके अलावा पैसिव स्मोकिंग, वायु प्रदूषण, औद्योगिक रसायनों के संपर्क और कुछ कार्यस्थलों पर मौजूद हानिकारक तत्व भी जोखिम को बढ़ाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि गैर-धूम्रपान करने वालों में भी प्रदूषण के कारण लंग कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।
इलाज के स्तर पर फेफड़ों का कैंसर चुनौतीपूर्ण माना जाता है। उन्नत अवस्था में सर्जरी संभव नहीं रह जाती और मरीज को कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी पर निर्भर रहना पड़ता है। इन उपचारों की लागत अधिक होती है और सफलता दर भी बीमारी के चरण पर निर्भर करती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि रोकथाम और समय पर जांच से लंग कैंसर से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है। धूम्रपान से दूरी, स्वच्छ वातावरण, जोखिम वाले लोगों की नियमित जांच और लक्षणों को गंभीरता से लेना सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जन-जागरूकता और शुरुआती स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के विस्तार से भविष्य में फेफड़ों के कैंसर के घातक प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

















