सौरभ जायसवाल
बृजमनगंज, महराजगंज। दिसंबर के जाते-जाते ठंड ने ऐसा प्रचंड रूप धारण कर लिया है कि आम जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो चुका है। हालात यह हैं कि इंसान तो इंसान, पशु-पक्षी भी ठंड से बचाव के उपाय खोजते नजर आ रहे हैं। ऐसे में नगर पंचायत की जिम्मेदारी बनती है कि वह गरीबों, राहगीरों और जरूरतमंदों को ठंड से राहत देने के लिए प्रभावी इंतजाम करे। लेकिन नगर पंचायत बृजमनगंज में ठंड से राहत के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह किसी गंभीर प्रशासनिक व्यवस्था से अधिक एक औपचारिक खानापूर्ति प्रतीत हो रहा है।
नगर पंचायत द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर अलाव जलाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। “अलाव जलाए जा रहे हैं” कहना शायद हकीकत से ज्यादा कागजी दावा होगा, क्योंकि जहां आग होनी चाहिए, वहां सिर्फ उम्मीदें सुलगती दिखाई देती हैं। गरीबों और राहगीरों के लिए लगाए गए अलावों की स्थिति यह है कि आग तो दूर, धुएं तक के दर्शन नहीं हो रहे।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अलाव के नाम पर जो लकड़ियां डाली जा रही हैं, वे पूरी तरह गीली हैं। गीली लकड़ियों की आपूर्ति देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो नगर पंचायत ने “ठंड से बचाने” की बजाय “आग से बचाने” का अभियान चला रखा हो। नगर पंचायत कर्मी लकड़ियां गिराते हैं, उन पर ज्वलनशील पदार्थ डालते हैं, कुछ देर के लिए ऊंची लपटें उठती हैं और फिर कुछ मिनटों में सब कुछ शांत हो जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम चरण होता है-सेल्फी। जैसे ही आग भड़कती है, फोटो खींची जाती है और कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। कुछ ही देर बाद अलाव ठंडा पड़ जाता है, जनता ठिठुरती रहती है और लकड़ियां ऐसे पड़ी नजर आती हैं मानो बारिश के इंतजार में हों। मजबूर लोग फिर कागज, पुराने टायर और कूड़ा डालकर अलाव में जान फूंकने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
जनवरी आने से पहले ही ठंड ने अपना कहर दिखाना शुरू कर दिया है। ऊपर से सूर्य देवता भी कई दिनों से “नो एंट्री मोड” में नजर आ रहे हैं। दोपहर में भी धूप के दर्शन दुर्लभ हो चुके हैं और शाम ढलते ही गलन ऐसा हमला करती है कि अलाव जरूरत नहीं बल्कि मजबूरी बन जाता है।
निष्पक्ष दर्पण के स्थानीय पत्रकार सौरभ जायसवाल ने जब जमीनी हकीकत का जायजा लिया तो पाया कि लगभग सभी प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर अलाव की लकड़ियां गीली थीं। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अलाव की व्यवस्था वास्तविक राहत के बजाय केवल औपचारिकता तक सीमित है।
बैरियर तिराहा टेंपो स्टैंड, बस स्टैंड, पोस्ट ऑफिस रोड, सहजनवा बाबू रोड, मस्जिद के पास और मेन रोड जैसे प्रमुख स्थानों पर हालात एक जैसे पाए गए। हर जगह अलाव के नाम पर लकड़ियों का ढेर तो दिखा, लेकिन आग नहीं। इससे राहगीरों, रिक्शा चालकों, मजदूरों और असहाय लोगों में भारी नाराजगी देखी गई।
इस संबंध में जब नगर पंचायत अध्यक्ष राकेश जायसवाल से बात की गई तो उन्होंने दावा किया कि सभी सार्वजनिक स्थानों और प्रत्येक वार्ड में पर्याप्त मात्रा में लकड़ी जलवाई जा रही है। हालांकि, जमीनी हकीकत उनके दावों पर सवाल खड़े करती नजर आई।
वहीं नगर पंचायत की अधिशासी अधिकारी सुरभि मिश्रा से फोन पर पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव करना उचित नहीं समझा। इससे आम जनता में यह संदेश गया कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर समस्या को लेकर गंभीर नहीं हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ठंड से लड़ने के लिए वास्तव में अलाव चाहिए या सिर्फ फोटो सेशन? क्योंकि बृजमनगंज में इस समय आग से ज्यादा मजाक जलता हुआ नजर आ रहा है और ठंड से कांपती जनता राहत की आस में प्रशासन की ओर देख रही है।


















