फ़ाइल फ़ोटो (चित्र साभार: AP)
नई दिल्ली। दिल्ली की हवा नवंबर में इतनी जहरीली स्तर पर पहुंच गई कि अक्टूबर की तुलना में प्रदूषण लगभग दोगुना दर्ज किया गया। दिसंबर की शुरुआत में भी राजधानी भारत के चौथे सबसे प्रदूषित शहर की श्रेणी में बनी हुई है। यह खुलासा सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताज़ा रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार नवंबर में दिल्ली का मासिक औसत पीएम 2.5 स्तर 215 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ, जबकि अक्टूबर में यह आंकड़ा 107 माइक्रोग्राम था। पूरे महीने में हवा की गुणवत्ता बेहद विकट रही—23 दिन “बहुत खराब”, 6 दिन “गंभीर” और 1 दिन “खराब” श्रेणी में दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्तर डब्ल्यूएचओ मानकों से लगभग 35 गुना अधिक है।
दिल्ली–एनसीआर में पराली जलाने का प्रभाव इस वर्ष काफी घटा है। पंजाब और हरियाणा में स्टबल बर्निंग में कमी के चलते इसका योगदान पिछले वर्ष के 20 प्रतिशत से घटकर इस वर्ष औसतन 7 प्रतिशत रह गया। चरम स्थिति में भी यह 22 प्रतिशत तक ही पहुंचा, जबकि नवंबर 2024 में अधिकतम योगदान 38 प्रतिशत दर्ज हुआ था। इसके बावजूद हवा की गुणवत्ता और बिगड़ने से यह साफ संकेत मिलता है कि वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक धुआं और निर्माण स्थलों से उड़ती धूल मुख्य प्रदूषण स्रोत बने हुए हैं।
रिपोर्ट में देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची भी जारी की गई है। गाजियाबाद 224 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के उच्च औसत स्तर के साथ सबसे ऊपर रहा। शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों में नोएडा, बहादुरगढ़, हापुड़, ग्रेटर नोएडा, बागपत, सोनीपत, मेरठ, रोहतक और दिल्ली शामिल हैं—इनमें छह उत्तर प्रदेश, तीन हरियाणा और एक दिल्ली के शहर हैं।
सीआरईए के विश्लेषक मनोज कुमार ने कहा, “पराली में कमी है, लेकिन एनसीआर के 29 में से 20 शहरों में प्रदूषण पिछले वर्ष से भी अधिक दर्ज किया गया। जब तक सेक्टर-वार उत्सर्जन में ठोस कटौती नहीं होगी, हवा राष्ट्रीय मानकों से ऊपर ही बनी रहेगी।”
वहीं, दिल्ली सरकार ने वायु गुणवत्ता सुधार के लिए वैज्ञानिक रणनीति तैयार करने हेतु विशेषज्ञ समूह का गठन किया है। पूर्व केंद्रीय पर्यावरण सचिव लीना नंदन इसकी अध्यक्षता करेंगी। यह समूह मौजूदा प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रमों की समीक्षा कर दीर्घकालिक और आपातकालीन उपायों के लिए नीतिगत सुझाव देगा।
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि इस बार पराली का प्रभाव भले ही कम हुआ हो, लेकिन स्थानीय प्रदूषण स्रोत अब दिल्ली–एनसीआर की हवा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। दिसंबर में भी प्रदूषण का स्तर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम श्रेणी में बना हुआ है।


















