शिव-पार्वती विवाह प्रेम, तपस्या और भक्ति का प्रतीक : पंडित चंद्रकांता जी महाराज

अमेठी के पलिया पश्चिम में कथा के दौरान राजा परीक्षित और कलयुग प्रवेश प्रसंग का किया वर्णन

पंकज तिवारी

जगदीशपुर, अमेठी। क्षेत्र के पलिया पश्चिम स्थित ठाकुर दुबे का पुरवा में आयोजित धार्मिक कथा कार्यक्रम के दूसरे दिन पंडित चंद्रकांता जी महाराज ने राजा परीक्षित और शिव-पार्वती विवाह का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

पंडित चंद्रकांता जी महाराज ने कहा कि कलयुग का प्रवेश राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट से हुआ था। उन्होंने बताया कि द्वापर युग की समाप्ति के समय कलयुग राजा परीक्षित के राज्य में विचरण करने लगा। जब राजा को इसकी जानकारी मिली तो वह उसे रोकने पहुंचे।

कथा के दौरान उन्होंने बताया कि राजा ने एक राजपुरुष को गाय और बैल को पीटते देखा। गाय पृथ्वी और बैल धर्म का प्रतीक था। राजा परीक्षित ने जब उस व्यक्ति को दंडित करना चाहा तो उसने स्वयं को कलयुग बताया। इसके बाद राजा ने उसे स्वर्ण, द्यूत, हिंसा और मद्य आदि स्थानों में रहने की अनुमति दी।

अवसर मिलते ही कलयुग राजा के स्वर्ण मुकुट में प्रवेश कर गया और उनके मस्तिष्क को दूषित कर दिया। इसी प्रभाव के कारण राजा परीक्षित ऋषि शमीक का अपमान कर बैठे और बाद में श्रृंगी ऋषि के श्राप का कारण बने।

कथा के दूसरे प्रसंग में पंडित चंद्रकांता जी महाराज ने भगवान भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह को प्रेम, तपस्या और भक्ति का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह किया था, जिसके बाद उनका पुनर्जन्म हिमालय के घर पार्वती के रूप में हुआ।

उन्होंने बताया कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।

कथा के दौरान यह भी बताया गया कि देवी पार्वती की तपस्या के समय देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव का ध्यान भंग करने भेजा था, लेकिन भगवान शिव ने तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में नारद मुनि ने हिमालय को शिव-पार्वती विवाह का प्रस्ताव दिया और भगवान शिव तथा देवी पार्वती का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ।

यह धार्मिक आयोजन सर्व इच्छापूर्ति हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शिव प्रकाश द्विवेदी, धर्मेंद्र कुमार द्विवेदी, शिवभूषण द्विवेदी, शशिभूषण द्विवेदी, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी, माधव प्रसाद द्विवेदी, प्रदीप द्विवेदी, अनुराग द्विवेदी सहित बड़ी संख्या में ग्रामवासी मौजूद रहे।

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